चाबहार बंदरगाह और नरम कूटनीति भारत के लिए एक मौका नवीना जाफ़ा @navinajafa

 

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हाल में हिंद महासागर से जुड़ी भू राजनीति के विषय में ग्वादर और चाबहार बंदरगाह काफी चर्चित रहें हैं। इस सख़्त कूटनीति के शतरंज के खेल में भूल जाते हैं कि आविष्कार नरम कूटनीति एक आकर्षक क्षमता रखती है। अगर आधुनिक दृष्टि से देखा जाए, यह दोनों बंदरगाह हालांकि पाकिस्तान व ईरान में स्थित हैं, मगर उनकी अंदरूनी प्राकृतिक पहचान बलूचिस्तान कि बलूचिता है जिसमें हमें ज्यादातर लगता है कि वहाँ के लोग केवल पहाड़ी और मुसलमान हैं मगर एक आम धारणा है कि वह लोग घुमंतू व खेती-बाड़ी के जीवन में लिपटे हैं।

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हम नज़रअंदाज़ कर देते हैं कि उनकी आंतरिक सामूहिक स्मृति में पश्चिम, मध्य तथा दक्षिण एशिया और यूनानी संबंधों की छवि दिखाई देती है। उनकी धारणाओं में हिंदु, ज़ोराष्ट्रियता और सूफी के रंग शामिल हैं जो कि उनकी अनेक भाषाओं में, हाथ कलाओं में, नाच-गाने,रस्मोरिवाज़, जीवन-मरण की प्रथा तथा परंपराओं में प्रदर्शित होतीं हैं। यह सारी छवियां हमें याद करने पर मजबूर कर देती हैं कि मनुष्य का इतिहास अलग-अलग समय पर ज़मीन व समुद्र पर सदियों से चला आ रहा है और यह विचारधाराओं और परंपराओं के अदले-बदले के रूपरेखा के सिलसिले का प्रमाण है।

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यह ही सांस्कृतिक धागे भारत को इस बलूचिस्तान के इलाके से एक अटूट बंधन में जोड़ देता है। कितनी ही आधुनिक राजनीतिक दीवारें खड़ी हो जाएँ यह बंधन कायम रहता है। एक ऐसा पहलू भारत को बालुचिस्तान तथा एशियाई देशों से जोड़ता है और वह है देवी के पंथ की परंपरा चाहे वह ईरान में इश्तार के नाम से जानी जाती है चाहे अफ़गानिस्तान में नाना के नाम से और चाहे हिंगलाज देवी की प्रथा। हिंगलाज देवी बलूच में काफी मान्यता रखतीं हैं। पौराणिक कहानी के अनुसार यह सती की कहानी से जुड़ी है। हिंगलाज देवी शाक्तों में 52 पीठ में से एक पीठ मानी जातीं हैं।

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इस जोड़ की कहानी सती की कहानी से जुड़ी है माना जाता है कि  देवी का सिर इसी स्थान पर गिरा था और यह अमूल्य कड़ी देवी की प्रथा से जुड़ जाती है। हिंगलाज देवी की पीठ पाकिस्तान में, हिंगोल राष्ट्र पार्क, लास बेला प्रान्त मकरन्त तट में बीहड़ पहाड़ों के बीचों-बीच में स्थित है, जिसकी तीर्थ-यात्रा बहुत कठिन व जटिल है और आज के आतंकवाद और राजनीतिक गड़बड़ी के कारण और भी खतरनाक बन गयी है।

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हिंदुस्तान में भी हिंगलाज देवी काफी सारे सांस्कृतिक सामूहिक से जुड़ीं  हैं। यह ज़रूर है कि हिंगलाज देवी शाक्तों के लिए खास है मगर यह भी आगे आता है कि हिंगलाज देवी की गुफा के अंदर एक शिला है जिसकी मान्यता गोरखनाथ कानफाटों के लिए दीक्षा समारोह के समय बहुत महत्त्वपूर्णता रखती है और सांस्कृतिक सामाजिक समूह जैसे कि अनेक व्यापारी कृषि समूह खत्री, चारण और आबाणियों के लिए भी यह ईष्ट देवी का स्थान रखतीं हैं और तो और हिंगलाज देवी के धार्मिक परिदृश्य के आसपास कई कुंड हैं, एक तिल का कुंड है जहां माना जाता है कि काले तिल धोने पर वह सफेद हो जाते हैं।

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सेंटर फॉर न्यू पर्सपेक्टिव एक दिल्ली में स्थित गैर सरकारी संगठन प्रबंध मंडल ने स्किल कॉरिडोर-कौशल गलियारी का विचार आगे रखा है और इस संकल्पना पर सेंटर फ़ॉर न्यू पर्सपेक्टिव के पास ट्रेडमार्क, व कॉपीराइट भी है। सेंटर फॉर न्यू पर्सपेक्टिव पारम्परिक कौशलताओं  में काम कर रहा है, इस छोटे से गैर सरकारी संगठन ने भारत और एशिया के अनेक हिस्सों पर स्किल मैपिंग का काम किया है। उसके विचार में यह बलूचिस्तान से भारत को जोड़ने में एक अनोखा मौका है जिसमें साझा सांस्कृतिक भूगोल एक अनोखी कूटनीति का अवसर बन सकता है, जिसमें हम एक पारंपरिक सांस्कृतिक कौशलता गलियारी (स्किल कॉरिडोर) का निर्माण कर सकते हैं। इस योजना की सहायता में भारत अनेक एशियाई देशों के साथ पारंपरिक कौशलताओं के सतत विकास प्रोग्राम के साथ-साथ लोगों का आदान-प्रदान बढ़ा सकता है और भावी एशिया की अनोखी पहचान बनाने में वह अपनी प्रमुख भूमिका अदा कर सकता है।

 

 

 

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